संक्षिप्त जीवन परिचयः श्री श्री 108 स्वामी भीष्म जी महाराज
मुजफ्फरनगर। (अलर्ट न्यू्ज) स्वामी भीष्म जी महाराज जी का जन्म 07 मार्च 1859 गांव घरोंडा (कुरुक्षेत्र) के सामान्य ग्रामीण पांचाल ब्राहाण परिवार में हुआ था।
बचपन से व्यायाम और पहलवानी का शोंक था। मात्र 17 वर्ष की आयु में कानपुर के एक विशाल दंगल में एक अंग्रेज पहलवान डेविड को हराकर भारतीयों का मान बढ़ाया। सन् 1877 में कान्तिकारियों से सम्पर्क हुआ। सन 1878 में कानपुर जाकर फौज में भर्ती हुए और कान्तिकारी साथियों की योजना के अनुसार ट्रेनिंग पूरी होने के बाद फौज से एक बन्दूक, एक पिस्टल और कुछ कारतूस लेकर भागे जो
मेरठ के एक जंगल में उन्ही कान्तिकारी साथियों को सोंपकर फरार हो गए।
सन् 1881 में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हुए गुरू आज्ञा से इंद्री छेदन
करके सन्यास की दीक्षा ली और भीष्म ब्रह्मचारी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
सन् 1886 में महर्षि दयानन्द जी का अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश पढकर आर्य
समाजी बने। वेदादि शास्त्रों तथा देव दयानन्द कृत ग्रन्थों का गहन अध्ययन
किया। स्वामी भीष्म जी महाराज ने 96 वर्ष तक आर्य समाज का प्रचार किया।
स्वामी जी ने लगभग 250 पुस्तकें लिखीं, जिनमें से 135 पुस्तकें उपलब्ध हैं,
90 विद्वान आर्य भजनोपदेशक तैयार किये जो सम्पूर्ण भारत में स्वतन्त्रता
आन्दोलन, समाज सुधार और वैदिक धर्म का प्रचार करते रहे। आज भी उनकी
शिष्य परम्परा के हजारों शिष्य देश विदेश में वैदिक धर्म के प्रचार व समाज सुधार के कार्य में संलग्न है।
सन् 1911 में स्वामी श्रद्धानन्द जी से भेंट हुई, उनके द्वारा संचालित शुद्धि सभा
में 3 वर्ष तक स्वागी भीष्म जी ने काम करते हुए. भटके हुए हजारों धर्मान्तरित
हिन्दुओं को शुद्ध करके पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित किया।
सन् 1919 में अंग्रेजों के रोल्ट एक्ट के विरुद्ध दिल्ली में स्वामी श्रद्धानन्द जी के
साथ सत्याग्रह में ब्रहाचारी भीष्म ने भाग लिया।
सन् 1919 से 1933 तक स्वामी भीष्म जी हिण्डन नदी के किनारे करैहडा गांव
के जंगल में संस्कृत पाठशाला चलाते रहे जो वास्तव में कान्तिकारियों के छिपने का गुप्त ठिकाना था, जहां चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह.असफाकउल्ला खान, लाल बहादुर शास्त्री. चौधरी चरण सिंह और रामचन्द्र जी विकल आदि आकर छुपते थे और स्वामी जी से सहायता प्राप्त करते थे।
सन् 1935 में घरौंडा में भीष्म भवन की स्थापना की। इस काल में अंग्रेज
सरकार ने घर पर तिरंगा झण्डा लगाना अपराध घोषित किया हुआ था किन्तु
ब्रिटिश सरकार के विरोध के बावजूद घरौंडा शहर में भीष्म भवन पर तिरंगा
झण्डा 1947 में देश आजाद होने तक शान से लहराता रहा।
सन् 1939 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हुए हैदराबाद सत्याग्रह में स्वामी भीम
जी ने भूमिगत रहकर अद्वितीय कार्य किया। स्वामी जी की प्रेरणा से उत्तर भारत
से हजारों आर्य वीरों ने दक्षिण हैदराबाद जाकर निजाम की जेलों को भर दिया
था। स्वामी जी की प्रेरणा से ही हरियाणा में सर्वाधिक अकेले घरौंडा शहर से 22 स्वतंत्रता सैनानी हैदराबाद राज्य की जेलों में गए।
17 अप्रैल 1939 में स्वामी भीष्म जी ने गुरूकुल घरौंडा की स्थापना की और
अपने विद्वान शिष्य स्वामी रामेश्वरानन्द जी को सौंप दिया। इसी गुरूकुल में से हजारों वैदिक विद्वान तैयार होकर निकले जिन्होने देश-विदेश में देश और धर्म का काम किया।
सन् 1940 में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने दिल्ली के कम्पनी बाग में देश के नौजवानों की एक विशाल सभा की जिसमें स्वामी भीष्म जी ने सुभाष बाबु को सेना तैयार करके अंग्रेज शासन को उखाड़ फेंकने की प्रेरणा देते हुए अपनी एक कविता सुनाई:
कहने सुनने का जवानों जमाना नहीं।
जवानी सफल होगी किश्ती पार करने से।
जवानी सफल हो क्रांति का प्रचार करने से।
जवानी सफल हो सेना के तैयार करने से।
पैर पीछे वक्त पर हटाना नहीं।
सुभाष चन्द्र बोस ने स्वामी जी की इस कविता को अपने पास रखते हुए आश्वासन दिया कि स्वामी जी महाराज परमात्मा आपकी यह इच्छा अवश्य पूरी करेगा। सभी जानते हैं कि सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन कर अंग्रेज सरकार की जड़ों का हिला दिया था। स्वामी भीष्म जी के भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान व समाज सुधार के कार्यों को देखते हुए सन् 1965 में तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी ने तथा 1981 में तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी जी ने स्वामी जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए अपने निवास पर सम्मानित किया था। इसी क्रम में 23-24मई 1981 में 121 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर स्वामी भीष्म जी महाराज का कुरूक्षेत्र में सार्वजनिक अभिन्नदन किया गया जिसमें भारत सरकार की ओर से तत्कालीन गृहमन्त्री ज्ञानी जैल सिंह जी अनेक केन्द्रीय मन्त्री सहित, हरियाणा सरकार के तत्कालीन मुख्यमन्त्री चौ०भजन लाल जी अपने मन्त्रीमण्डल सहित, लाला जगत नारायण जी. पदम श्री स्वामी कल्याण देव जी तथा शहीद भगत सिंह जी के छोटे भाई सरदार
कुलतार सिंह जी आदि अनेक राजनैतिक सामाजिक व धार्मिक नेताओं ने उपस्थित होकर स्वामी जी का अभिनन्दन किया था।
27 मार्च 1983 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी ने स्वामी जी के आश्रम (पांचाल ब्राह्मण धर्मशाला पाण्डू पिण्डारा) में उपस्थित होकर स्वामी भीष्म जी महाराज से आर्शीवाद लिया।
31 जुलाई 1983 को कोलकता में पश्चिम बंगाल, बिहार, उडीसा राज्यों के आर्य प्रतिनिधी सभाओं व अन्य सामाजिक संस्थाओं के द्वारा समाज सुधार के विभिन्न
क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 124 वर्षीय स्वामी भीष्म जी महाराज का शानदान नागरिक अभिनन्दन किया गया। 08 जनवरी 1984 को 125 वर्ष की आयु में प्रातः 3 बजे स्वेच्छा से ईश्वर चिन्तन करते हुए प्राणायाग द्वारा देह त्याग कर मोक्ष मार्ग पर चल दिए।
संकलन: शिवकुमार आर्य